विधवा महिला गोद लेने के लिए पति की सहमति अनिवार्य नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट
मुख्य बातें
- •बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि विधवा महिला गोद लेने के लिए पति की सहमति जरूरी नहीं है।
- •कोर्ट ने भारतीय दत्तक एवं संरक्षण अधिनियम, 2015 की धारा 57 का हवाला दिया और महिला के अधिकार को महत्वपूर्ण बताया।
- •फैसले में कहा गया कि गोद लेने का अधिकार महिला के व्यक्तिगत निर्णय पर निर्भर करता है।
- •महिला ने अपने दूसरे विवाह से जन्मे बेटे को गोद लेने की इच्छा व्यक्त की थी, जिसे पति ने चुनौती दी थी।
- •कोर्ट ने बच्चे के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए महिला के पक्ष में फैसला सुनाया।
मुंबई, 10 जुलाई 2024: बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि विधवा महिला अपने बच्चे को गोद लेने के लिए पति की सहमति जरूरी नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गोद लेने का अधिकार महिला के व्यक्तिगत निर्णय पर निर्भर करता है और इसे पति की अनुमति से जोड़ना गलत है। यह फैसला एक महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया, जिसमें उसने अपने दूसरे विवाह से जन्मे बेटे को गोद लेने की इच्छा व्यक्त की थी।
अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि गोद लेने का अधिकार महिला के संवैधानिक अधिकारों का हिस्सा है। कोर्ट ने भारतीय दत्तक एवं संरक्षण अधिनियम, 2015 की धारा 57 का हवाला दिया, जिसमें गोद लेने की प्रक्रिया और शर्तों का उल्लेख है। कोर्ट ने कहा कि गोद लेने के लिए महिला की मानसिक और भावनात्मक स्थिति मायने रखती है, न कि पति की सहमति। इस फैसले से समाज में विधवाओं के अधिकार को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
