क्लाउडे मिथोस : एआई से बढ़ा साइबर हमलों का खतरा, भारत पर क्या असर?

मुख्य बातें
- •क्लाउडे मिथोस एआई मॉडल ने 2026 तक 10,000 से अधिक उच्च या गंभीर श्रेणी की कमजोरियों की पहचान की है, मुख्यतः ओपन-सोर्स परियोजनाओं में।
- •एंथ्रोपिक ने इस मॉडल को सीमित दायरे में रखा है, लेकिन इसके लीक होने की खबरें सामने आई हैं और इसे वित्तीय स्थिरता बोर्ड को भी दिखाया गया है।
- •भारत में 2025 में 29.44 लाख साइबर घटनाओं को संभाला गया, जिसमें 1,530 अलर्ट और 390 कमजोरी नोट्स शामिल हैं।
- •बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवा, बिजली, परिवहन और विनिर्माण क्षेत्रों में पुराने सिस्टम चल रहे हैं, जो एआई द्वारा खोजी गई कमजोरियों के प्रति संवेदनशील हैं।
कृत्रिम मेधा (एआई) के युग में साइबर सुरक्षा का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। हाल ही में सामने आया क्लाउडे मिथोस नामक एआई मॉडल ने सॉफ्टवेयर में मौजूद गंभीर कमजोरियों को खोजने की प्रक्रिया को पूरी तरह से बदल दिया है। यह मॉडल न केवल पुराने सॉफ्टवेयर कोड में मौजूद खामियों को खोजने में सक्षम है, बल्कि इसकी मदद से बड़ी संख्या में कमजोरियों का पता लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि क्लाउडे मिथोस जैसे एआई उपकरणों के आने से साइबर हमलों का खतरा काफी बढ़ गया है, खासकर उन देशों और उद्योगों के लिए जो पुराने तकनीकी ढांचे पर निर्भर हैं। भारत भी इनमें से एक है, जहां बड़ी संख्या में सरकारी और निजी संस्थाएं पुराने सिस्टम चला रही हैं।
क्लाउडे मिथोस का विकास करने वाली कंपनी एंथ्रोपिक ने इस मॉडल को सीमित दायरे में रखा है। इसके बावजूद, इसके माध्यम से अब तक 10,000 से अधिक उच्च या गंभीर श्रेणी की कमजोरियां खोजी जा चुकी हैं। ये कमजोरियां मुख्य रूप से ओपन-सोर्स परियोजनाओं में पाई गई हैं। हालांकि एंथ्रोपिक ने इस मॉडल को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं कराया है, लेकिन इसके लीक होने की खबरें सामने आ चुकी हैं। कंपनी ने वित्तीय स्थिरता बोर्ड (Financial Stability Board) जैसे वैश्विक नियामकों को भी इस मॉडल के संभावित जोखिमों के बारे में अवगत कराया है, क्योंकि इसका सीधा असर बैंकों, बाजारों और वित्तीय प्रणालियों पर पड़ सकता है।



