80-90 के दशक के भारतीय सुपरहीरो और कॉमिक्स इंडस्ट्री का उदय तथा पतन: ₹100 करोड़ से पीछे हटने का कारण

मुख्य बातें
- •और 90 के दशक में 'चंदामामा', 'चंपक', 'नागराज', 'चाचा चौधरी' जैसे किरदार बच्चों के लिए थे लोकप्रिय।
- •भारतीय कॉमिक्स उद्योग का टर्नओवर एक समय ₹100 करोड़ तक पहुंच गया था।
- •ए.एच. व्हीलर जैसे नेटवर्क के टूटने और पारिवारिक विवादों के कारण उद्योग का पतन हुआ।
- •डिजिटल युग में कॉमिक्स अब मोबाइल और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से पहुंच रही हैं।
- •पुराने सुपरहीरो अब भी बच्चों के बीच लोकप्रिय हैं, लेकिन उनका प्रसार अब डिजिटल माध्यमों से हो रहा है।
80 और 90 के दशक में भारतीय बच्चों के मनोरंजन और ज्ञान का एक महत्वपूर्ण माध्यम थे पारंपरिक कॉमिक्स। 'चंदामामा' और 'चंपक' जैसे पत्रिकाओं के माध्यम से न केवल मनोरंजन होता था, बल्कि संस्कार और ज्ञान भी मिलता था। वहीं, 'नागराज', 'चाचा चौधरी', 'साबू' और 'परमाणु' जैसे देसी सुपरहीरो बच्चों के लिए किसी परम सत्य से कम नहीं थे। इन किरदारों ने न केवल बच्चों के मनोरंजन को प्रभावित किया, बल्कि भारतीय कॉमिक्स उद्योग को एक नई पहचान भी दिलाई। हालांकि, आज यह उद्योग अपने चरम से काफी पीछे है। बीते समय में ₹100 करोड़ तक पहुंचने वाले इस उद्योग का पतन कैसे हुआ और इसके पीछे क्या कारण थे, आइए जानते हैं।




