भगवान शिव से मिला वरदान बना अंधकासुर के लिए श्राप, जानिए पूरा पौराणिक किस्सा

मुख्य बातें
- •भगवान शिव को संहार और कल्याण का देवता माना जाता है, जिन्हें मात्र एक लोटे जल से प्रसन्न किया जा सकता है।
- •अंधकासुर का जन्म शिव के आशीर्वाद से हुआ था, जिसे हिरण्याक्ष की तपस्या के कारण दिया गया था।
- •शिव से मिले वरदान के कारण अंधकासुर के रक्त से उत्पन्न हुए नए दैत्य, जिससे तीनों लोकों में उत्पात मचा।
- •शिव ने स्वयं ही युद्ध कर अंधकासुर का अंत किया और मंगल देव ने उसके रक्त को समाहित कर नए दैत्यों के जन्म को रोका।
भगवान शिव को संहार और कल्याण का देवता माना जाता है। कहा जाता है कि वे मात्र एक लोटे जल से ही प्रसन्न हो जाते हैं। युगों-युगों से उनकी महिमा का गुणगान किया जाता रहा है। इसी क्रम में एक पौराणिक कथा है, जिसमें शिव द्वारा दिए गए वरदान ने असुर अंधकासुर के लिए श्राप का रूप ले लिया। आइए जानते हैं त्रेतायुग की यह रोचक और रहस्यमयी कहानी।
त्रेतायुग के दौरान, असुरराज हिरण्याक्ष ने पुत्र प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनके पसीने से जन्मे अंधे बालक को उन्हें दे दिया। हालांकि बालक जन्म से ही अंधा था, लेकिन उसकी इच्छा थी पूरे ब्रह्मांड पर अपना साम्राज्य स्थापित करने की। अपनी इस कामना को पूरा करने के लिए उसने भगवान शिव की कठोर तपस्या आरंभ कर दी। वर्षों तक चलने वाली इस तपस्या में अंधकासुर पूर्णतः लीन रहा। अंततः उसकी तपस्या सफल हुई और शिव उसके सामने प्रकट हुए।
