मैसूर पैलेस: ऐतिहासिक धरोहर और पर्यटन का प्रमुख केंद्र
मुख्य बातें
- •मैसूर पैलेस का निर्माण 1897 में हुआ था और इसे ब्रिटिश वास्तुकार लॉर्ड हेनरी इरविन ने डिजाइन किया था।
- •महल की वास्तुकला इंडो-सारासेनिक शैली में है, जिसमें गुलाबी और सुनहरे रंग का बाहरी हिस्सा प्रमुख है।
- •प्रवेश शुल्क भारतीयों के लिए 70 रुपये, विदेशियों के लिए 200 रुपये और बच्चों के लिए 30 रुपये है।
- •महल में दिवाली के दौरान प्रकाश उत्सव मनाया जाता है, जो लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है।
मैसूर पैलेस, जिसे अम्बा विलास पैलेस के नाम से भी जाना जाता है, कर्नाटक राज्य के मैसूर शहर में स्थित एक प्रमुख ऐतिहासिक स्मारक है। यह महल वाडियार राजवंश का शाही निवास हुआ करता था और आज भी अपनी शानदार वास्तुकला और समृद्ध इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। हाल ही में, इस पैलेस से जुड़े कई अपडेट सामने आए हैं, जिसमें इसके रखरखाव, पर्यटन सुविधाओं और विशेष आयोजनों की जानकारी शामिल है।
मैसूर पैलेस का निर्माण 1897 में शुरू हुआ था, जब पुराने महल में आग लगने के बाद महाराजा कृष्णराज वाडियार चतुर्थ ने इसे फिर से बनवाया। इस महल का डिजाइन ब्रिटिश वास्तुकार लॉर्ड हेनरी इरविन ने तैयार किया था, जिन्होंने इंडो-सारासेनिक वास्तुकला शैली को अपनाया। महल में मुख्य रूप से तीन प्रमुख हिस्से हैं: बाहरी गुंबद, मध्य स्तर और आंतरिक निजी क्षेत्र। इसका बाहरी हिस्सा गुलाबी और सुनहरे रंग से सजा हुआ है, जबकि भीतरी भाग में सोने की पत्तियों से सजावट की गई है। महल के परिसर में एक विशाल उद्यान भी है, जो दर्शकों को आकर्षित करता है।
मैसूर पैलेस पर्यटकों के लिए सुबह 10 बजे से शाम 5:30 बजे तक खुला रहता है। प्रवेश शुल्क भारतीय नागरिकों के लिए 70 रुपये, जबकि विदेशी पर्यटकों के लिए 200 रुपये निर्धारित है। बच्चों के लिए प्रवेश शुल्क 30 रुपये रखा गया है। महल में प्रवेश करने से पहले आगंतुकों को सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता है। इसके अलावा, महल में फोटोग्राफी की अनुमति है, लेकिन वीडियो कैमरे के लिए अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता है।
