जोधपुर की नीली पहचान: कब, कैसे और क्यों हुई शहर की दीवारों पर नीले रंग की रंगाई?
मुख्य बातें
- •जोधपुर शहर को 'ब्लू सिटी' के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यहां के अधिकांश घरों और दीवारों पर नीले रंग की रंगाई की जाती है।
- •नीले रंग की रंगाई की शुरुआत 19वीं सदी की शुरुआत में हुई, जिसमें धार्मिक और वैज्ञानिक कारण शामिल थे।
- •नीला रंग घरों को ठंडा रखने और कीटों से बचाने में सहायक होता है, साथ ही इसे भगवान शिव और विष्णु की भक्ति का प्रतीक भी माना जाता है।
- •'गोबर नीला' (Indigo) नामक प्राकृतिक रंग का उपयोग नीले रंग को बनाने के लिए किया जाता था, जिसे स्थानीय भाषा में 'नील' कहा जाता है।
- •राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन द्वारा जोधपुर की नीली विरासत को संरक्षित रखने के लिए विभिन्न प्रयास किए जा रहे हैं।
राजस्थान के पश्चिमी भाग में स्थित जोधपुर शहर अपनी अनूठी नीली रंगत के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। शहर के अधिकांश घरों, गलियों और दीवारों पर नीला रंग देखने को मिलता है, जिसके कारण इसे 'ब्लू सिटी' (नीली नगरी) के नाम से जाना जाता है। यह रंग न केवल शहर की सुंदरता में चार चांद लगाता है, बल्कि इसके पीछे एक रोचक इतिहास और वैज्ञानिक कारण भी छिपा हुआ है।
जोधपुर में नीले रंग की रंगाई की परंपरा 19वीं सदी की शुरुआत से मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार, इस रंग का उपयोग मुख्य रूप से धार्मिक और वैज्ञानिक कारणों से किया गया। एक प्रमुख मान्यता के अनुसार, भगवान शिव के भक्तों द्वारा नीले रंग का उपयोग उनकी भक्ति का प्रतीक माना गया। इसके अलावा, नीला रंग गर्म जलवायु में घरों को ठंडा रखने में भी सहायक होता है, क्योंकि यह सूर्य की किरणों को परावर्तित करता है।






