नेपाल के सीमा विवाद में ब्रिटेन ने दिया बड़ा झटका, बालेन शाह की ब्रिटेन से मदद की अपील हुई खारिज

मुख्य बातें
- •नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारत के साथ सीमा विवाद में ब्रिटेन से मदद मांगी थी, लेकिन ब्रिटेन ने इसे द्विपक्षीय मामला बताकर खारिज कर दिया।
- •बालेन शाह के मुख्य सलाहकार कुमार ब्यांजंकर ने ब्रिटिश राजदूत रॉब फेन से मुलाकात की थी और सुगौली संधि (1816) का हवाला देते हुए हस्तक्षेप की अपील की थी।
- •सुगौली संधि के तहत नेपाल का दावा है कि कालापानी सहित कुछ क्षेत्र भारत को सौंप दिए गए थे, जिसे नेपाल स्वीकार नहीं करता।
- •बालेन शाह के विवादित बयान के बाद विपक्ष ने उन्हें राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाया है, जबकि विदेश मंत्रालय ने इसे गलत बताया है।
- •बालेन शाह पर आरोप लग रहा है कि उन्होंने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बयान देकर देश की छवि को धूमिल किया है।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह (बालेन शाह) को भारत के साथ चल रहे सीमा विवाद में ब्रिटेन से मिलने वाली मदद का झटका लगा है। दरअसल, बालेन शाह ने ब्रिटेन के राजदूत रॉब फेन से सुगौली संधि (1816) का हवाला देते हुए हस्तक्षेप की अपील की थी, लेकिन ब्रिटेन ने इसे खारिज कर दिया। ब्रिटेन ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल नेपाल और भारत के बीच का द्विपक्षीय मुद्दा है, जिसमें ब्रिटेन हस्तक्षेप नहीं करेगा। सूत्रों के अनुसार, बालेन शाह के मुख्य सलाहकार कुमार ब्यांजंकर ने हाल ही में काठमांडू में ब्रिटिश राजदूत रॉब फेन से मुलाकात की थी। इस बैठक में ब्यांजंकर ने कहा कि सुगौली संधि (1816) में ब्रिटेन भी एक प्रमुख पक्षकार था, इसलिए सीमा विवाद को सुलझाने के लिए ब्रिटेन को आगे आना चाहिए। उनका तर्क था कि अगर ब्रिटेन इस मुद्दे पर पहल करेगा, तो नेपाल और भारत के बीच समझौता हो सकता है। हालांकि, ब्रिटेन के राजदूत फेन ने इस अपील को ठुकराते हुए कहा कि यह मामला द्विपक्षीय है और इसमें ब्रिटेन कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। इसके बाद बालेन शाह के सलाहकार खाली हाथ लौट आए। बता दें कि सुगौली संधि 1816 में ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच हुई थी, जिसमें दोनों देशों की सीमाओं का निर्धारण किया गया था। नेपाल का दावा है कि इस संधि के तहत काठमांडू की कुछ भूमि, जैसे कालापानी, को भारत को सौंप दिया गया था। नेपाल इस संधि को मानने से इनकार करता रहा है। वहीं, बालेन शाह ने हाल ही में संसद में दिए गए एक विवादित बयान में कहा कि जब वे प्रधानमंत्री बने, तो उन्हें पता चला कि नेपाल ने भी भारत की कुछ जमीनों पर कब्जा कर रखा है। इस बयान पर विपक्षी कम्युनिस्ट पार्टी ने उन्हें राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाया है। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भी इस बयान को गलत करार देते हुए स्पष्ट किया कि नेपाल के कुछ किसान भारत में खेती करते हैं, लेकिन यह कोई भूमि विवाद नहीं है। बालेन शाह के इस बयान के बाद पूरे देश में राजनीतिक हलचल मची हुई है। विपक्षी दलों ने उन्हें तुरंत माफी मांगने की मांग की है, जबकि सरकार का कहना है कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। बालेन शाह पर आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बयान देकर देश की छवि को धूमिल किया है। इस पूरे घटनाक्रम ने नेपाल की राजनीति में नए सिरे से बहस छेड़ दी है कि क्या बालेन शाह का नेतृत्व देश के हितों की रक्षा करने में सक्षम है या नहीं। वहीं, भारत के साथ चल रहे सीमा विवाद को लेकर भी बालेन शाह की सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। नेपाल में राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बालेन शाह की इस अपील को ब्रिटेन द्वारा ठुकराए जाने से उनके नेतृत्व की कमजोरी उजागर हुई है। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि क्या बालेन शाह इस विवाद को सुलझाने में सफल होंगे या फिर यह मामला और गंभीर रूप ले लेगा।
