मदुरै दीपम विवाद: भगवान कार्तिकेय की पहाड़ी पर कैसे पहुंची मुस्लिम दरगाह, 700 साल पुरानी कहानी
मुख्य बातें
- •मदुरै दीपम त्योहार के दौरान कार्तिकेय पहाड़ी पर मुस्लिम दरगाह पर रोशनी करने की परंपरा लगभग 700 साल पुरानी है।
- •इस दरगाह का निर्माण 13वीं शताब्दी में मदुराई के सुल्तान शेख जलालुद्दीन द्वारा किया गया था।
- •विवाद के चलते तमिलनाडु सरकार ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है, जो इस परंपरा के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व की जांच करेगी।
- •इतिहासकारों का मानना है कि यह परंपरा दोनों धर्मों के लोगों के बीच सद्भावना का प्रतीक रही है।
तमिलनाडु के मदुरै में पारंपरिक रूप से मनाए जाने वाले मदुरै दीपम त्योहार को लेकर हाल ही में विवाद उत्पन्न हो गया है। इस त्योहार के दौरान भगवान सुब्रमण्यम (कार्तिकेय) की पहाड़ी पर एक मुस्लिम दरगाह पर रोशनी करने की परंपरा रही है। हालांकि, हाल के वर्षों में इस परंपरा को लेकर सवाल उठने लगे हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह परंपरा लगभग 700 साल पुरानी है और इसे लेकर विवाद की जड़ें मध्यकालीन इतिहास में छिपी हुई हैं।
मदुरै शहर में स्थित कार्तिकेय पहाड़ी, जिसे स्थानीय लोग 'थिरुप्परनकुंड्रम' कहते हैं, एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहां भगवान कार्तिकेय का मंदिर स्थित है, जिसे तमिलनाडु के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है। इसी पहाड़ी पर एक मुस्लिम दरगाह भी स्थित है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण 13वीं शताब्दी में हुआ था। इतिहासकारों का मानना है कि मदुराई के सुल्तान शेख जलालुद्दीन ने इस दरगाह का निर्माण करवाया था, जिसके बाद से ही इस स्थान पर दोनों धर्मों के लोगों द्वारा पूजा-अर्चना की जाती रही है।
