भारतीय जनता पार्टी ने चार राज्यों के लिए नए प्रदेश अध्यक्षों का ऐलान किया, दो नेताओं का कांग्रेस से है राजनीतिक सफर का आगाज

मुख्य बातें
- •भारतीय जनता पार्टी ने पंजाब, त्रिपुरा सहित चार राज्यों के लिए नए प्रदेश अध्यक्षों का ऐलान किया है, जिनमें दो नेताओं का राजनीतिक सफर कांग्रेस से शुरू हुआ था।
- •पंजाब में पार्टी ने वरिष्ठ नेता सरदार केवल सिंह ढिल्लों को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, जो पहले कांग्रेस में थे।
- •त्रिपुरा में अभिषेक देबरॉय को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है, जिनका शुरुआती राजनीतिक सफर भी कांग्रेस से जुड़ा रहा है।
- •बीजेपी ने अपनी रणनीति बदली है और अब स्थानीय प्रभाव वाले नेताओं को ज्यादा महत्व दे रही है, जहां पार्टी अपने विस्तार के दौर में है।
- •इससे पार्टी को दोहरा फायदा मिलता है, एक तरफ विपक्ष के मजबूत चेहरों को अपने साथ जोड़ा जाता है और दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश होती है।
भारतीय जनता पार्टी ने गुरुवार को चार राज्यों के लिए नए प्रदेश अध्यक्षों का ऐलान किया। जिन चार नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है, उनमें दो ऐसे चेहरे हैं जिनकी शुरुआत बीजेपी से नहीं, बल्कि कांग्रेस से हुई थी। इसे बीजेपी की संगठनात्मक सोच में आए बड़ी बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। पंजाब में पार्टी ने वरिष्ठ नेता सरदार केवल सिंह ढिल्लों को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। ढिल्लों लंबे समय तक कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय रहे और मालवा क्षेत्र में उनका अच्छा प्रभाव माना जाता रहा है। वे 2007 और 2012 में कांग्रेस के टिकट पर बरनाला से विधायक चुने गए थे। 2012 के चुनाव में उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की थी। इसके अलावा वे पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। हालांकि, बाद के वर्षों में उनका राजनीतिक ग्राफ कुछ कमजोर पड़ा। 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के संगरूर लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया। अब पार्टी ने उन्हें पंजाब इकाई की कमान देकर यह संकेत दिया है कि वह राज्य की राजनीति में नए समीकरणों के साथ आगे बढ़ना चाहती है। त्रिपुरा में अभिषेक देबरॉय को कमान त्रिपुरा में अभिषेक देबरॉय को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। वे फिलहाल गोमती जिले में बीजेपी संगठन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे और 2023 में विधायक भी चुने गए। दिलचस्प बात यह है कि उनका शुरुआती राजनीतिक सफर भी कांग्रेस से ही जुड़ा रहा है। बाद में वे बीजेपी में शामिल हुए और अब संगठन में अहम भूमिका तक पहुंचे हैं। सामान्य तौर पर बीजेपी ने कई राज्यों के गैर भाजपाई नेताओं को मुख्यमंत्री तो बनाया है लेकिन संगठन में सामान्य तौर पर पार्टी हमेशा पार्टी के मूल कैडर के नेताओं को ही ऊंच पदों पर मौका देती रही है। हालांकि, पंजाब में इससे पहले भी बीजेपी ने गैर भाजपा बैकग्राउंड के सुनील जाखड़ को 2023 में प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। ऐसे राज्यों में बीजेपी ने बदली रणनीति बीजेपी को लंबे समय से एक कैडर आधारित और वैचारिक रूप से अनुशासित पार्टी माना जाता रहा है, जहां संगठन के बड़े पद आमतौर पर उन नेताओं को मिलते थे जो वर्षों से पार्टी और उसके वैचारिक ढांचे से जुड़े रहे हों। हालांकि, पिछले कुछ समय में पार्टी ने खासतौर पर उन राज्यों में अपनी रणनीति बदली है, जहां उसे सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों के आधार पर विस्तार की जरूरत महसूस हो रही है। पंजाब इसका बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। इससे पहले 2023 में कांग्रेस से बीजेपी में आए सुनील जाखड़ को भी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। ऐसे में केवल सिंह ढिल्लों की नियुक्ति उसी रणनीति का विस्तार मानी जा रही है। हालांकि, संगठन में बाहरी नेताओं को सीमित अवसर देने की छवि बीजेपी की रही है, लेकिन सत्ता और सरकार के स्तर पर पार्टी पहले भी दूसरे दलों से आए नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां देती रही है। दूसरे दलों से आए नेताओं को दिया बड़ा पद असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, बिहार के सम्राट चौधरी, पश्चिम बंगाल में सुभेंदु अधिकारी, त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू और मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने दूसरे दलों से बीजेपी में आने के बाद पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया। बीजेपी अब उन राज्यों में स्थानीय प्रभाव वाले नेताओं को ज्यादा महत्व दे रही है, जहां पार्टी अभी अपने विस्तार के दौर में है। इससे पार्टी को दोहरा फायदा मिलता है। एक तरफ विपक्ष के मजबूत चेहरों को अपने साथ जोड़ा जाता है और दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश होती है। इन नियुक्तियों को देखकर इतना जरूर कहा जा सकता है कि बीजेपी अब सिर्फ पारंपरिक कैडर राजनीति तक सीमित रहने के बजाय चुनावी जरूरतों और सामाजिक समीकरणों के हिसाब से संगठनात्मक प्रयोग करने में भी पीछे नहीं हट रही है।






